देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान

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जिला ब्यूरो चीफ जबलपुर // प्रशांत वैश्य : 79990 57770


वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इस गाने के बोल हकीकत प्रतीत हो रहे हैं जैसा कि इस महामारी ने पूरे विश्व में कोहराम मचा रखा है वहीं दूसरी तरफ पूरे भारत में मजदूरों की क्या दुर्दशा हो रही है यह हम और आप भली-भांति देख रहे हैं और समझ रहे हैं तमाम प्रदेशों की मजदूरों का पलायन यह सब दर्शाता है इस महामारी के दौर में चाहे वह केंद्र सरकार हो या प्रदेश सरकार हो मजदूरों की स्थिति साफ नजर आ रही है मजदूरों को लेकर सरकार कितनी गंभीरता दिखा रही है सभी दल अपनी अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं कोई भी सरकार छलावा करने से वंचित नहीं रहना चाहती है.


जैसा कि बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं की मजदूरों के लिए शासन सारी व्यवस्थाएं करा रहा है लेकिन उसका दूसरा पहलू कि सच्चाई कुछ और नजर आ रही है ना मजदूरों को भरपेट भोजन मिल रहा है ना ही उनको घर वापस जाने के लिए कोई मदद मिल रही है देखा जाए तो जिन मजदूरों को ट्रेन की सुविधा उपलब्ध कराई गई उसमें भी भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पार कर चुका है मजदूरों से सरकार द्वारा पैसे वसूले जा रहे हैं आखिर सरकार के दावे खोखले नजर आ रहे हैं एक तरफ केंद्र सरकार यह कह रही है मजदूरों की ट्रेन यात्रा का खर्च केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार उठा रही है आखिरकार वह कौन लोग हैं जो इन दावों को पूरी तरह विफल बना रहे हैं आखिरकार जब सरकारें पूरा खर्च उठा रही हैं उसके बाद भी मजदूरों की टिकट की वसूली कौन कर रहा है यह अपने आप में बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह दर्शाता है


यहां तक भी मजदूरों की पीड़ा समाप्त होती नजर नहीं आ रही इसके बाद कठिनाइयों का दूसरा दौर शुरू होता है किसी तरह मजदूर यात्रा के लिए तैयार हो जाते हैं उसके बाद भी उनको भोजन का प्रबंध किया जाता है ना ही इस भीषण गर्मी में पानी तक नसीब नहीं हो पाता है और जो भोजन यात्रा के दौरान दिया जाता है वह भी भ्रष्टाचार के परवान चढ़ा होता है.


मैं मजदूर मुझे देवों की धरती से क्या लेना देना


यह सिर्फ एक कविता नहीं बल्कि आज यह एक सच्चाई बन गई है मजदूर अपना घर बार छोड़कर रोजी रोटी कमाने दूसरे प्रदेश जाता है यहां तक कि छोटे मकान से लेकर बड़ी-बड़ी इमारतों सड़कों महलों जैसे होटलों का निर्माण करता है जिसमें सबसे बड़ी भूमिका मजदूरों की होती है तो क्या इस आपातकाल की स्थिति में सरकारों का कर्तव्य नहीं होता कि वह मजदूरों का भरण पोषण कर सकें आखिर जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाते नजर आ रहे हैं


वर्तमान स्थिति में वह मजदूर जिसने ना ही ट्रेनों की ना ही बसों की सुविधा मिली वह अपने घर को पैदल ही वापस लौटने को मजबूर होकर हजार किलोमीटर पैदल चल रहे हैं पैरों में छाले पड़ जाते हैं भूखे प्यासे अपनी जान भी गंवा दे रहे हैं क्या गलती है उन मजदूरों की वहीं दूसरी तरफ सरकार दूसरे देशों में फंसे भारतीय लोगों को प्लेन तथा पानी के जहाज से लेकर बिना कोई रकम लिए वापस ला रहे हैं वहीं दूसरी तरफ दिन रात काम करने वाले मजदूरों की यह दुर्दशा हो रही है कि पैसे देने के बावजूद वह सुविधा से वंचित वह कर मर रहा है आखिर इसका जिम्मेदार कौन कौन इनकी जवाबदारी लेगा यह सरकार की मंशा को साफ दर्शाती है विदेशों से आई महामारी और मर रहे मजदूर?


आज की स्थिति में यह देखा जा रहा है सरकार द्वारा जिन ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है वह पूरी तरह एसी कोचों से भरी हुई है क्या आपको लगता है कि यह सुविधा मजदूरों के लिए है या पैसे वालों के लिए है जो मजदूर दो वक्त की रोटी रोटी नसीब नहीं हो पा रही है वह ऐसी ट्रेनों में सफर करके अपने घर लौट पाएगा लगता है मोदी जी का सपना साकार होने वाला है इस देश में अब एक भी गरीब नहीं रह पाएगा


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