कोरोना संकट मे मीडिया की अहम् भूमिका को भुल गये लोग- क्या शासन और क्या प्रशासन
कोरोना संकट मे मीडिया की अहम् भूमिका को भुल गये लोग- क्या शासन और क्या प्रशासन

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ब्यूरो चीफ नागदा, जिला उज्जैन // विष्णु शर्मा 8305895567



मीडिया के जज्बे को प्रणाम बिना स्वार्थ के कर रहा है संक्रमण मे भी काम



कोविड 19 कोरोना वायरस के संक्रमण से पूरे देश मे हाहाकार मचा हुआ है सभी अपनी अपनी ताकत लगा रहे है इस संक्रमण को रोकने मे चाहे वह पुलिस प्रशासन हो चाहे वो प्रशासनिक अमला हो चाहे स्वास्थ विभाग की पुरी टीम हो सभी अपने अपने स्थर से इस महामारी पर नियंत्रण पाना चाह रहे है ओर सभी इनकी तारीफों के पुल भी बांध रहे है इन सभी योद्धाओं के प्रयासों के कसीदे भी पड़ रहे है। जो होना लाज्मी भी है। इस देश की जनता भी बहुत ही भाऊक ओर भोली है यदि ये अधिकारी सख्ती करे तो अधिकारी खराब ना करे तो भी अधिकारी खराब,बस घूम रहे है कोई कार्यवाही ही नही कर रहे है जैसी बातें करते नही थकते। 


क्यो की मेरा देश महान


सब से ज्यादा बधाई के पात्र पत्रकार एव मीडिया है जो इन बधाई पाने वाले अधिकारियो को जानकारी मौहैया कराती है हर छोटी से छोटी जानकारी प्रसाशन एव पुलिस को देती है जिसकी वजह से अधिकारी भी उन जगहो तक पहुचते है।कौन कहा से आया कौन गया, कहाँ क्या हो रहा है सभी जानकारी मीडिया बताती है।मीडिया इन अधिकारियो को हिरो भी बनाती है ओर जब इन्ही के बारे मे सत्य बात लिखती है तो अधिकारी को बुरा लगता है आखिर क्यो?


पत्रकार का काम पत्रकार कर रहा है अधिकारी अपना काम कर रहे है इस कोरोना संकरण मे पत्रकारो को कोई भी सुविधा नही दी गई, ना ही शासन ने ना ही प्रसाशन ने । अधिकारी जो कार्यवाही कर रहे है वह भी मीडिया ही जनता तक पहुचाती है ।अधिकारी वाह वाही मीडिया की खबरो से लुट रही है पत्रकार आज भी वही का वही है। केवल अच्छा सुनने ओर देखने की आदत हो गई है अधिकारी के बारे मे सच लिखो ती अधिकारी को बुरा लगता है । अधिकारियों की कार्य प्रणाली किसी भी पत्रकार से छुपी नही है। हर अधिकारी ईमानदार नही है ओर हर ईमानदार बेमान नही है यह देश इसी तरह चल रहा है ओर चलता रहेगा क्यो की मेरा देश महान।


कोरोना के इस संकट मे सभी को केवल कबीरदास का दोहा याद रखना चाहिये -


निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
इसका अर्थ यह हैं कि व्यक्ति को सदा चापलूसों से दूरी और अपनी निंदा करने वालों को अपने पास ही रखना चाहिए, क्यूंकि निंदा सुन कर ही हमारे अन्दर स्वयं को निर्मल करने का विचार आ सकता है और यह निर्मलता पाने के लिए साबुन और पानी कि कोई आवश्यकता नहीं होती है ।
आज के युग में शायद ही ऐसा होता है, क्योकिं जो हमारी बुराई करते हैं, अक्सर हम उन से दुर ही भागते हैं ।


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